नवंबर 02 | सभी मृत विश्वासियों की आत्माका पर्व
2 नवम्बर को माता कलीसिया सभी मृत विश्वासियों की आत्मा की शांति एवं स्वर्ग पहुंचने के लिये प्रार्थना करने का आव्हान करती है। काथलिक विश्वास के अनुसार विश्वासी की मृत्यु के उपरांत उसकी आत्मा संभवतः तीन स्थानों पर जा सकती है।
यदि कोई विश्वासी पूर्ण अनुग्रह की स्थिति में मरता है तो उसकी आत्मा स्वर्ग में ईश्वर के पास पहुंचती है। यदि कोई विश्वासी आत्मघातक पाप या नश्वर पाप की स्थिति में मरता है तो उसकी आत्मा स्वाभाविक तौर पर नरक में जायेगी। तीसरा स्थान शोधन-स्थल है। यदि कोई विश्वासी पाप की स्थिति में मरे किन्तु यदि उसके पाप नश्वर प्रकृति के नहीं हो तो आत्मा शोधन-स्थल पहुंचती है। ऐसा कलीसिया का विश्वास है कि अधिकांश लोगों जो मरण समय में क्षमा-योग्य पापों से ग्रसित है, उनकी आत्मायें शोधन-स्थान पहुंचती है।
आत्माओं के स्वर्ग पहुंचने के पूर्व पूर्ण शुद्धिकरण तथा उनकी मूल पवित्रता को प्राप्त करने के लिये शोधन-स्थल अत्यंत आवश्यक है। मक्काबियों के दूसरे ग्रंथ 12:42-46 में हम पढते है कि ततकालीन यहूदियों ने अपने मृतक भाईयों के पापों की आत्मा शांति के लिये इस प्रकार बलि चढाने हेतु चंदा एकत्र कर येरूसालेम भेजा, ’’इसके बाद उन्होंने प्रार्थना की और यह निवेदन किया कि उनके द्वारा (मृतकों) किये हुए अपराध पूर्णतः क्षमा कर दिये जायें।…………इसके बाद यूदाह ने लगभग दो हजार रूपये का चंदा एकत्र किया और उसे येरूसालेम भेज दिया जिससे वहां पाप के प्रायश्चित के रूप् में बलि चढायी जाये। उसने पुनरूत्थान का ध्यान रख कर यह उत्तम तथा सराहनीय कार्य सम्पन्न किया।…….वह जानता था कि प्रभु-भक्ति में मरने वालों के लिए एक अपूर्व पुरस्कार सुरक्षित है। इसलिए उसने प्रायश्चित्त के बलिदान का प्रबन्ध किया, जिससे मृतक अपने पाप से मुक्त हो जायें।’’ इसके अलावा जकर्या, प्रवक्ता ग्रंथ तथा मत्ती के सुसमाचार में इस सच्चाई का जिक्र मिलता है।
कलीसिया हमें सिखाती हैं कि मृतकों की आत्मायें विश्वासियों की प्रार्थनाओं के द्वारा पापों से मुक्त तथा पूर्ण शुद्धता प्राप्त करती है। इस दिन ख्राीस्तीय विश्वासी अपने प्रियजनों की कब्रों पर जाकर प्रार्थना करते है तथा उनके लिये मिस्सा बलिदान चढाते हैं। यह दिन हमें अपने जीवन के सुधार के लिये भी आव्हान करता है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवित रहते समय हमें हम अपनी आत्मा की भलाई के लिये कार्य कर सकते हैं तथा मरण उपरांत हमें अपनी पूर्ण शुद्धता के लिये दूसरों की प्रार्थनाओं पर निर्भर रहना पडता है। हमें भी भलाई तथा सदाचरण का जीवन जीना चाहिये तथा मृतकों के लिये निरतंर प्रार्थना तथा मिस्सा बलिदान चढाना चाहिये।



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