14 दिसंबर, 16वीं शताब्दी के कार्मेलाइट पुरोहित, क्रूस भक्त संत योहन का पर्व स्मारक है, जिन्हें एविला की संत टेरेसा के साथ मिलकर अपने तपस्वी घर्मसंघ में सुधार के लिए जाना जाता है, और क्लासिक आध्यात्मिक ग्रंथ ‘‘द डार्क नाइट ऑफ द सोल‘‘ लिखने के लिए जाना जाता है।

1926 से कलीसिया के धर्माचार्य के रूप में सम्मानित, उन्हें कभी-कभी ‘‘रहस्यमय धर्माचार्य‘‘ कहा जाता है, जो ईश्वर के साथ आत्मा के मिलन पर उनके शिक्षण की गहराई के लिए एक श्रद्धांजलि के रूप में है।

रेशम-बुनाई के व्यापार में लगे पालकों की सबसे छोटी संतान, योहन डी येप्स का जन्म 1542 के दौरान स्पेनिश शहर एविला के पास फोंटिवरोस में हुआ था। उनके पिता गोंजालो की अपेक्षाकृत कम उम्र में मृत्यु हो गई, और उनकी मां कैटालिना ने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए संघर्ष किया। योहन ने अपने प्रारंभिक वर्षों से अकादमिक सफलता पाई, लेकिन एक प्रशिक्षु के रूप में एक व्यापार सीखने के अपने प्रयास में असफल रहे। इसके बजाय उन्होंने कई साल गरीबों के लिए एक अस्पताल में काम करते हुए बिताए, और मदीना डेल कैम्पो शहर के एक येसु समाजी कॉलेज में अपनी पढ़ाई जारी रखी।

मठवासी जीवन के लिए एक आह्वान को समझने के बाद, योहन ने 1563 में कार्मलाइट तपस्वी धर्मसंघ में प्रवेश किया। वह कार्मेलाइट्स में शामिल होने से पहले ही गंभीर शारीरिक तपस्या का अभ्यास कर रहे थे, और उन्हें उनके जीवन के मूल नियम के अनुसार जीने की अनुमति मिली – जिसने एकांत, मौन, गरीबी, काम, और चिंतनशील प्रार्थनापर जोर दिया। 1567 में सलामांका में अध्ययन करने के बाद योहन ने एक पुरोहित के रूप में दीक्षा प्राप्त की, लेकिन कार्मेलाइट्स के साथ रहने के बजाय अधिक कठोर कार्थुसियन तपस्वी घर्मसंघ में स्थानांतरित होने पर विचार किया।

इससे पहले कि वह ऐसा कदम उठा पाता, वह कार्मेलाइट धर्मबहन से मिला, जिन्हें बाद में अविला की संत टेरेसा के रूप में संत घोषित किया गया। 1515 में जन्मी, टेरेसा 1535 में उस तपस्वी घर्मसंघ में शामिल हुईं, जिसमें पवित्र धार्मिक जीवन को मुक्ति का सबसे सुरक्षित मार्ग बताया गया था। उस समय से उन्होंने उल्लेखनीय आध्यात्मिक प्रगति की थी, और 1560 के दशक के दौरान उन्होंने कर्मेलियों को उनके मूल जीवन के सख्त पालन के लिए वापस लाने के लिए एक आंदोलन शुरू किया। उन्होंने योहन को तपस्वी घर्मसंघ छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि इसके सुधार के लिए काम करने के लिए मना लिया।

अपने धार्मिक नाम को ‘‘संत मथियस के योहन ‘‘ से ‘‘क्रूस के योहन‘‘ में बदलते हुए, पुरोहित ने नवंबर 1568 में इस काम को शुरू किया, साथ में दो अन्य लोगों के साथ, जिनके साथ उन्होंने एक छोटा और सादगीवाला घर साझा किया। एक समय के लिए, योहन ‘‘डिस्कैल्ड कार्मेलाइट्स‘‘ के नए सदस्यों के प्रभारी थे – सुधार समूह द्वारा अपनाया गया नाम, क्योंकि उन्होंने गरीबी के संकेत के रूप में साधारण जूते के बजाय सैंडल पहने थे। उन्होंने संत टेरेसा के नेतृत्व में अविला में एक मठ में पापस्वीकार अनुश्ठाता के रूप में भी पांच साल बिताए।

उनका सुधार आंदोलन तेजी से बढ़ा, लेकिन 1570 के दशक के दौरान इसके भविष्य को खतरे में डालने वाले गंभीर विरोध का भी सामना करना पड़ा। 1577 के दिसंबर की शुरुआत में, तपस्वी घर्मसंघ के भीतर योहन के काम पर विवाद के दौरान, सख्त पालन के विरोधियों ने उन्हें पकड़कर एक छोटी सी कोठरी में कैद कर दिया। उनकी परीक्षा नौ महीने तक चली और इसमें अन्य कठोर दंडों के साथ-साथ नियमित सार्वजनिक कोड़े भी शामिल थे। फिर भी इसी अवधि के दौरान उन्होंने कविता की रचना की जो उनके आध्यात्मिक लेखन के आधार के रूप में काम करेगी।

योहन 1578 के अगस्त में जेल से भागने में सफल रहे, जिसके बाद उन्होंने डिसकैल्ड कार्मेलाइट समुदायों की स्थापना और निर्देशन का काम फिर से शुरू किया। एक दशक के दौरान उन्होंने ‘‘द एसंत ऑफ माउंट कार्मेल,‘‘ ‘‘द स्पिरिचुअल कैंटिकल‘‘ और ‘‘द लिविंग फ्लेम ऑफ लव‘‘ के साथ-साथ ‘‘द डार्क नाइट ऑफ द सोल‘‘ जैसे कार्यों में अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं को स्थापित किया। लेकिन तपस्वी घर्मसंघ के भीतर की साजिश ने अंततः उन्हें उनके नेतृत्व की स्थिति से वंचित कर दिया, और उनके अंतिम वर्षों में उन्हें बीमारी के साथ-साथ और भी दुर्व्यवहार सहना पडा।

अक्टूबर 1582 में अविला की मृत्यु के नौ साल बाद, 14 दिसंबर, 1591 की प्रभात में क्रूस भक्त संत योहन की मृत्यु हो गई। संदेह, दुर्व्यवहार और अपमान ने धार्मिक जीवन में उनके अधिकांश समय को चित्रित किया था, लेकिन यह समझा जाता है कि इन परीक्षणांे ने इस दुनिया की चीजों पर अनकी निर्भरता को तोड़कर उन्हें ईश्वर के करीब लाया। तदनुसार, उनका लेखन सभी चीजों से ऊपर ईश्वर से प्रेम करने की आवश्यकता पर बल देता है – किसी भी चीज के द्वारा न रोके जाना, और इसी तरह कुछ भी रोक कर नहीं रखना।

उनके जीवन के अंत के करीब ही संत योहन के मठवासी अधिकारी ने उनकी बुद्धि और पवित्रता को पहचाना था। यद्यपि उनकी प्रतिष्ठा को वर्षों से अन्यायपूर्ण रूप से नुकसान हुआ था, लेकिन उनकी मृत्यु के तुरंत बाद यह स्थिति उलट गई। उन्हें 1675 में धन्य घोषित किया गया, 1726 में संत घोषित किया गया था, और 20वीं शताब्दी में संत पिता पियुस ग्यारहवें द्वारा कलीसिया के धर्माचार्य का नाम दिया गया। संत योहन की मृत्यु की 400 वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक पत्र में, संत पिता योहन पौलुस द्वितीय – जिन्होंने संत के लेखन पर धर्माचार्य हेतु थीसिस लिखी थी – ने स्पेनिश रहस्यवादी के अध्ययन की सिफारिश की, जिन्हें उन्होंने ‘‘विश्वास में गुरू और जीवित ईश्वर के लिए गवाह‘‘ कहा। ‘‘

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