संत विन्सेंट डी पॉल का जन्म 24 अप्रैल, 1581 को फ्रांसीसी गांव पौय में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। उनकी पहली औपचारिक शिक्षा फ्रांसिसियों द्वारा प्रदान की गई थी। उन्होंने इतना अच्छा किया कि उन्हें पास के एक धनी परिवार के बच्चों को पढ़ाने के लिए काम पर रखा गया। उन्होंने टूलूज विश्वविद्यालय में अपनी औपचारिक पढ़ाई जारी रखने के लिए अध्यापन से अर्जित धन का उपयोग किया जहां उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया।

उन्हें सन 1600 में पुरोहिताभिषेक दिया गया था और वे कुछ समय के लिए टूलूज में ही रहे। 1605 में, मार्सिले से नारबोन की यात्रा करने वाले एक जहाज पर, उन्हें पकड़ लिया गया, ट्यूनिस लाया गया और दास के रूप में बेचा गया। दो साल बाद वे अपने मालिक के साथ भागने में सफल रहे और दोनों फ्रांस लौट आए।

संत विन्सेंट डी पॉल अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए एविग्नन और बाद में रोम गए। वहाँ रहते हुए वे काउंट ऑफ गोगनी के याजक वर्ग बन गए और उन्हें जरूरतमंद गरीबों को पैसे बांटने का प्रभारी बनाया गया। वे थोड़े समय के लिए क्लिची में एक छोटे से पल्ली के पल्ली पुरोहित बने, साथ में उन्होंने एक शिक्षक और आध्यात्मिक निर्देशक के रूप में भी काम किया।

उस समय से उन्होंने अपना जीवन प्रचार मिशनों और गरीबों को राहत प्रदान करने में बिताया। उन्होंने उनके लिए अस्पताल भी स्थापित किए। यह काम उनके लिए जुनून बन गया। बाद में उन्होंने अपनी दिलचस्पी और प्रेरिताई को कैदीयों तक बढ़ा दिया। इन आत्माओं के बीच प्रचार करने और उनकी सहायता करने की आवश्यकता इतनी महान थी और इन मांगों को पूरा करने की उनकी अपनी क्षमता से परे कि उन्होंने मदद करने के लिए लेडीज ऑफ चैरिटी, एक सामान्य महिला संस्थान की स्थापना की, साथ ही पुरोहितों का एक धार्मिक संस्थान – पुरोहितों की मिशन मंडली, जिन्हें आमतौर पर अब विन्सेंशियन के रूप में जाना जाता है।

यह उस समय की बात है जब फ्रांस में बहुत से पुरोहित नहीं थे और वहां जो पुरोहित थे, वे न तो सुसंगठित थे और न ही अपने जीवन के प्रति वफादार थे। विन्सेंट ने याजक वर्ग को सुधारने में मदद की जिस तरीके से उन्हें निर्देश दिया जाता था और पौरोहित्य के लिए तैयार किया जाता था। उन्होंने इसे पहले रिट्रीट की प्रस्तुति के माध्यम से और बाद में हमारे आधुनिक दिन के सेमिनरी के लिए एक अग्रदूत विकसित करने में मदद करके किया। एक समय उनका समुदाय 53 उच्च स्तरीय सेमिनरी का निर्देशन कर रहा था। पुरोहितों और आम लोगों के लिए खुले उनके रिट्रीट में इतनी अच्छी तरह से भाग लिया गया था कि ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ‘‘अपने पिछले 23 वर्षों में 20,000 से अधिक लोगों के बीच ख्रीस्तीय भावना का संचार किया।‘‘

86 देशों में लगभग 4,000 सदस्यों के साथ विंसेंशियन धर्मसमाजी आज हमारे साथ हैं। विंसेंशियन पुरोहितों के अपने तपस्वी धर्मसंघ के अलावा, संत विंसेंट ने संत लुईस डी मारिलैक के साथ डॉटर्स ऑफ चैरिटी की स्थापना की। आज 18,000 से अधिक धर्मबहने 94 देशों में गरीबों की जरूरतों को पूरा कर रही हैं। 27 सितम्बर, 1660 को जब पेरिस में उनकी मृत्यु हुई तब वे अस्सी वर्ष के थे। वे ‘‘फ्रांसीसी कलीसिया के सफल सुधारक के प्रतीक बन गए थे‘‘। संत विंसेंट को कभी-कभी ‘‘द एपोसल ऑफ चैरिटी‘‘ और ‘‘गरीबों के पिता‘‘ के रूप में जाना जाता है।

मृत्यु के बाद भी उनका हृदय अभ्रष्ट रहा और उसे कॉन्वेंट ऑफ द सिस्टर्स ऑफ चैरिटी में पाया जा सकता है और उनकी हड्डियों को चर्च ऑफ द लाजरिस्ट मिशन में स्थित संत के मोम के पुतले में जड़ा गया है। दोनों जगह पेरिस, फ्रांस में स्थित हैं।

संत विंसेंट को दो चमत्कारों के लिए श्रेय दिया गया है – अल्सर से ठीक हुई एक मठवासिनी और लकवा से ठीक हुई एक आम महिला। 16 जून, 1737 को उन्हें संत पिता क्लेमेंट तेरहवें द्वारा संत घोषित किया गया था। यह बताया गया है कि संत विंसेंट ने अपने जीवनकाल में 30,000 से अधिक पत्र लिखे थे और 18वीं शताब्दी में लगभग 7,000 पत्र एकत्र किए गए थे। उनके पत्रों के कम से कम पांच संग्रह आज अस्तित्व में हैं।

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