बीसवीं सदी विश्व महायुध्दों का समय था। दुनिया में अशांति फैली हुई थी। फौस्तीना का जन्म उसी सदी की शुरूआत में सन 1905 में पोलेंड में हुआ था। बीस साल की आयु में उन्होंने करुणा की माँ मरियम की धर्मबहनों के धर्मसंघ में प्रवेश किया। उन्होंने 5 अक्टूबर 1938 की अपनी मृत्यु तक अपने तेरह साल का धर्मसंघीय जीवन बिताया। इस दौरान प्रभु येसु ने कई बार संत फौस्तीना को दर्शन दिया और उन्हें ईश्वरीय करुणा की शिक्षा प्रदान की। येसु ने अपने दर्शन में संत फौस्तीना से पास्का के दूसरे इतवार को ईश्वरीय करूणा के त्योहार के रूप में मनाने का निर्देश दिया। संत फौस्तीना के अनुसार इस त्योहार पर ईश्वरीय करुणा पर भरोसा रख कर पाप-स्वीकार कर परम प्रसाद ग्रहण करने वालों को पापों की क्षमा तथा सभी पाप-दण्ड से मुक्ति प्राप्त होती है। येसु ने संत फौस्तीना को बताया कि विश्वासी लोग इस त्योहार के पहले पुण्य शुक्रवार से ईश्वरीय करुणा की नोरोजी प्रार्थना करते हुए इस त्योहार के लिए अपने आप को तैयार करें।

संत फौस्तीना का कहना है कि येसु ने ही उन्हें करुणा की माला-विनती की प्रार्थनाएँ सिखायीं। सन 1931 के फरवरी महीने में संत फौस्तीना को येसु का दर्शन हुआ। येसु सफेद कपडे पहने हुए थे, उनका एक हाथ आशिष देने के लिए उठा हुआ था और दूसरा हाथ छाती पर रखा हुआ था जहाँ से दो प्रकार की किरणें निकल रहीं थीं – लाल और सफेद रंग की किरणें। येसु ने यह भी बताया कि लाल और सफेद किरणें रक्त और जल के प्रतीक हैं जो भाले से उनके हृदय को छेदित किये जाने पर बहाये गये थे। (देखिए संत फौस्तीना की डायरी §299) दर्शन में येसु ने संत फौस्तीना को यह आदेश दिया कि उन्होंने जिस रूप को दर्शन में देखा था, उसी का तस्वीर बनवायें और उसके नीचे “येसु, मैं तुझ पर भरोसा रखता हूँ” अंकित करें। (देखिए संत फौस्तीना की डायरी §47) येसु ने संत फौस्तीना से इस तस्वीर की उपासना को विश्वासियों के बीच फैलाने को कहा।

संत फौस्तीना के अनुसार येसु चाहते हैं कि हम न केवल करुणा के लिए प्रार्थना करें, बल्कि करुणा के कार्य में भी लगे रहें। प्रभु येसु ने एक दर्शन में संत फौस्तीना से कहा, “मैं तुम को अपने पडोसियों के प्रति करुणा दिखाने के तीन तरीके देता हूँ : पहला – अपने कर्मों से, दूसरा – अपने वचनों से और तीसरा – अपनी प्रार्थना से।“ (संत फौस्तीना की डायरी §742) संत फौस्तीना के अनुसार दोपहर के तीन बजे की प्रार्थनाएँ बहुत प्रभावशाली होती है क्योंकि वह येसु के अनुसार करुणा का सर्वोत्तम समय है।

अप्रैल सन 1978 में परम धर्मपीठ ने ईश्वरीय करुणा की भक्ति के प्रचार के लिए अनुमति दी। सन 1993 में संत पापा योहन पौलुस द्वितीय ने फौस्तीना को धन्य और सन 2000 में संत घोषित किया।

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