धन्य कुँवारी मरियम का जन्म – “हमारे उद्धार की प्रभात”
पर्व: धन्य कुँवारी मरियम का जन्मोत्सव – 8 सितंबर
मुख्य पाठ: मीका 5:1-4क; रोमियों 8:28-30; मत्ती 1:1-16, 18-23
प्रिय भाइयों और बहनों,
आज का दिन हमारे लिए बहुत ही आनंद और कृतज्ञता का दिन है।
आज हम हमारी माता मरियम का जन्मदिन मनाते हैं।
जिस प्रकार किसी प्रिय व्यक्ति के जन्मदिन पर हम केवल उसके जन्म की तारीख याद नहीं करते, बल्कि उस व्यक्ति के हमारे जीवन में आने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, उसी प्रकार आज हम माता मरियम के जन्म के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं।
आज हम उस स्त्री के जन्म का उत्सव मनाते हैं, जिसे परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु की माता बनने के लिए चुना।
8 सितंबर को मनाया जाने वाला यह पर्व प्राचीनतम मरियम-संबंधी पर्वों में से एक है। इसकी परंपरा पूर्वी कलीसिया में प्राचीन काल से मिलती है और रोम में भी यह पर्व सातवीं शताब्दी में प्रचलित हुआ। सुसमाचार मरियम के जन्म का विवरण नहीं देता; उनके माता-पिता के रूप में योआखिम और अन्ना का उल्लेख प्राचीन ईसाई परंपरा से आता है। (Vatican News)
इसलिए आज का संदेश केवल यह नहीं है कि “मरियम का जन्म हुआ।”
बल्कि संदेश यह है:
परमेश्वर इतिहास में अपना महान कार्य अक्सर छोटी और साधारण शुरुआतों से करता है।
1. मरियम का जन्म – उद्धार की प्रभात
संत पापा पॉल षष्ठम ने मरियम के जन्मोत्सव को “पूरे संसार की आशा और उद्धार की प्रभात” के रूप में प्रस्तुत किया है। (Vatican)
कितनी सुंदर बात है!
सूर्योदय से पहले आकाश में हल्की रोशनी दिखाई देती है।
सूरज अभी दिखाई नहीं देता, लेकिन प्रभात हो चुकी होती है।
इसी प्रकार मरियम का जन्म मसीह के आगमन की प्रभात है।
अभी यीशु संसार में प्रकट नहीं हुए थे।
अभी बेथलेहेम का चरनी नहीं आया था।
अभी क्रूस नहीं आया था।
अभी पुनरुत्थान नहीं हुआ था।
लेकिन परमेश्वर की योजना आगे बढ़ रही थी।
एक छोटी बच्ची का जन्म हुआ।
दुनिया की दृष्टि में शायद यह एक साधारण घटना थी।
लेकिन परमेश्वर की दृष्टि में यह अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी।
क्योंकि यह वही बच्ची थी जो आगे चलकर कहेगी:
“देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ; आपके वचन के अनुसार मेरे लिए हो।”
और उसके “हाँ” के द्वारा परमेश्वर का वचन देहधारी हुआ।
2. परमेश्वर छोटी शुरुआतों से महान कार्य करता है
आज के सुसमाचार में हम यीशु की वंशावली सुनते हैं।
अब्राहम से लेकर दाऊद तक, दाऊद से लेकर अनेक पीढ़ियों तक—एक लंबी सूची।
हम सोच सकते हैं:
“इतने सारे नाम क्यों?”
लेकिन इसके पीछे एक गहरा संदेश है।
परमेश्वर का उद्धार का कार्य एक दिन में नहीं हुआ।
परमेश्वर ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना कार्य किया।
और अंततः उसी इतिहास में मरियम आती हैं।
फिर मरियम के द्वारा यीशु आते हैं।
इसलिए आज हम अपने जीवन को भी नई दृष्टि से देखें।
कभी-कभी हम सोचते हैं:
“मेरी जिंदगी में ऐसा क्या विशेष है?”
“मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूँ।”
“मैं एक साधारण परिवार में रहता हूँ।”
“मेरा काम साधारण है।”
“मेरी प्रार्थना छोटी है।”
लेकिन याद रखिए:
परमेश्वर के लिए कोई जीवन छोटा नहीं है।
एक छोटी प्रार्थना से महान परिवर्तन शुरू हो सकता है।
एक क्षमा से परिवार बदल सकता है।
एक अच्छे शब्द से किसी निराश व्यक्ति को जीवन की आशा मिल सकती है।
एक माता-पिता की प्रार्थना से बच्चे का जीवन बदल सकता है।
एक बच्चे का विश्वास पूरे परिवार के लिए आशीर्वाद बन सकता है।
मरियम का जन्म हमें सिखाता है कि परमेश्वर साधारण जीवनों में असाधारण कार्य कर सकता है।
3. मरियम – एक बच्ची से परमेश्वर की माता तक
आज हम मरियम को एक महान संत के रूप में देखते हैं।
लेकिन आज हमें यह याद रखना चाहिए कि मरियम भी कभी एक छोटी बच्ची थीं।
जिसने बाद में यीशु को अपनी बाहों में उठाया, उसे कभी उसकी माता ने अपनी बाहों में उठाया होगा।
जिसने बाद में यीशु के चरणों के साथ चलकर बेथलेहेम, नासरत और यरूशलेम का मार्ग तय किया, उसके भी कभी छोटे-छोटे कदम रहे होंगे।
जिसने कहा:
“प्रभु की दासी हूँ”
उसने भी कभी अपनी माता-पिता से बातें करना सीखा होगा।
यह कितना सुंदर रहस्य है!
इसलिए आज का पर्व हमें हर बच्चे की गरिमा की याद दिलाता है।
हर बच्चा परमेश्वर का उपहार है।
हर बच्चे को प्रेम चाहिए।
हर बच्चे को सुरक्षा चाहिए।
हर बच्चे को विश्वास की शिक्षा चाहिए।
हर बच्चे को एक ऐसा परिवार चाहिए जहाँ उसे यह महसूस हो:
“मैं प्रिय हूँ। मैं परमेश्वर का उपहार हूँ।”
4. मरियम हमें “हाँ” कहना सिखाती हैं
भाइयों और बहनों,
मरियम के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण शब्द था:
“हाँ।”
घोषणा के समय स्वर्गदूत ने परमेश्वर की योजना बताई।
मरियम के सामने भविष्य की सारी परिस्थितियाँ स्पष्ट नहीं थीं।
उन्हें नहीं पता था कि आगे क्या होगा।
उन्हें नहीं पता था कि बेथलेहेम में क्या कठिनाइयाँ आएंगी।
उन्हें नहीं पता था कि मिस्र भागना पड़ेगा।
उन्हें नहीं पता था कि उनके पुत्र को क्रूस पर मरते देखना पड़ेगा।
फिर भी उन्होंने कहा:
“प्रभु की दासी हूँ।”
यही विश्वास है।
विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हमें भविष्य की हर बात मालूम हो।
विश्वास का अर्थ है:
“हे प्रभु, मुझे सब कुछ समझ में नहीं आता, लेकिन मैं आप पर भरोसा करता हूँ।”
आज शायद परमेश्वर हमसे भी एक “हाँ” मांग रहे हैं।
किसी को क्षमा करने के लिए।
किसी से मेल-मिलाप करने के लिए।
किसी बुरी आदत को छोड़ने के लिए।
प्रार्थना में वापस आने के लिए।
अपने परिवार के लिए समय देने के लिए।
किसी गरीब की सहायता करने के लिए।
अपने जीवन में परमेश्वर की इच्छा स्वीकार करने के लिए।
हम कहते हैं:
“पहले मुझे सब कुछ समझा दीजिए, फिर मैं हाँ कहूँगा।”
लेकिन मरियम हमें सिखाती हैं:
“पहले परमेश्वर पर भरोसा करो; फिर कदम उठाओ।”
5. प्रतीक्षा करने वालों के लिए आशा
आज का पर्व उन सभी लोगों के लिए विशेष संदेश रखता है जो प्रतीक्षा कर रहे हैं।
किसी को नौकरी की प्रतीक्षा है।
किसी को विवाह की प्रतीक्षा है।
किसी को संतान की प्रतीक्षा है।
किसी को बीमारी से मुक्ति की प्रतीक्षा है।
किसी को विदेश से बुलावे की प्रतीक्षा है।
किसी को परिवार में शांति की प्रतीक्षा है।
किसी को अपने बच्चे के बदलने की प्रतीक्षा है।
किसी को वर्षों से अपनी प्रार्थना के उत्तर की प्रतीक्षा है।
और शायद कोई मन ही मन कह रहा है:
“हे प्रभु, मेरी प्रार्थना कब सुनी जाएगी?”
आज मरियम का जन्म हमें एक संदेश देता है:
“प्रतीक्षा करते हुए विश्वास मत खोइए।”
परमेश्वर की चुप्पी का अर्थ परमेश्वर की अनुपस्थिति नहीं है।
कभी-कभी परमेश्वर हमारी आंखों से छिपकर काम कर रहे होते हैं।
6. मरियम – हमारे परिवारों की माता
आज का दिन परिवारों के लिए भी बहुत सुंदर अवसर है।
हम अपने परिवारों को माता मरियम के संरक्षण में सौंपें।
आज प्रत्येक परिवार अपने घर में एक छोटा-सा संकल्प कर सकता है:
हम साथ में प्रार्थना करेंगे।
हम एक-दूसरे को क्षमा करेंगे।
हम बच्चों को विश्वास सिखाएंगे।
हम बुजुर्गों का सम्मान करेंगे।
हम गरीबों की सहायता करेंगे।
हम घर में प्रेम और शांति का वातावरण बनाएंगे।
याद रखें:
जहाँ प्रेम है, वहाँ मरियम की उपस्थिति है।
जहाँ क्षमा है, वहाँ मरियम की उपस्थिति है।
जहाँ प्रार्थना है, वहाँ मरियम की उपस्थिति है।
जहाँ गरीब और दुखी व्यक्ति के लिए स्थान है, वहाँ मरियम की आत्मा है।
7. मरियम हमेशा हमें यीशु के पास ले जाती हैं
मरियम की भक्ति का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है:
हमें यीशु के पास ले जाना।
मरियम स्वयं कभी केंद्र नहीं बनतीं।
वह हमेशा अपने पुत्र की ओर संकेत करती हैं।
काना के विवाह में उन्होंने कहा:
“जो कुछ वह तुमसे कहे, वही करो।”
यह मरियम का पूरा संदेश है।
आज भी माता मरियम हमसे यही कहती हैं:
“यीशु के पास जाओ।”
जब तुम दुखी हो—यीशु के पास जाओ।
जब तुम डरते हो—यीशु के पास जाओ।
जब तुम पाप में गिरते हो—यीशु के पास जाओ।
जब तुम निराश हो—यीशु के पास जाओ।
जब तुम्हें कोई रास्ता दिखाई नहीं देता—यीशु के पास जाओ।
मरियम हमें अपने पास रोककर नहीं रखतीं।
वह हमारा हाथ पकड़कर यीशु तक ले जाती हैं।
8. दुख में भी विश्वास
मरियम का जीवन केवल आनंद से भरा हुआ नहीं था।
उनके जीवन में भी बहुत दुःख था।
उन्होंने अपने पुत्र को अस्वीकार होते देखा।
उन्होंने क्रूस का मार्ग देखा।
उन्होंने अपने पुत्र को क्रूस पर देखा।
और फिर भी वे वहाँ थीं।
क्रूस के नीचे।
यह मरियम की महानता है।
वह केवल यीशु के चमत्कारों के समय माता नहीं थीं।
वह क्रूस के समय भी माता थीं।
इसलिए आज जो लोग दुख में हैं, वे मरियम की ओर देखें।
यदि आपका जीवन कठिन है, कहिए:
“माँ, मेरे साथ रहो।”
यदि परिवार में संकट है:
“माँ, हमारे परिवार के साथ रहो।”
यदि बीमारी है:
“माँ, हमारे रोगी के साथ रहो।”
यदि कोई बच्चा भटक गया है:
“माँ, मेरे बच्चे को यीशु के पास वापस लाओ।”
9. आज माता मरियम को क्या उपहार दें?
आज हम माता मरियम का जन्मदिन मना रहे हैं।
हम फूल चढ़ाएंगे।
मोमबत्तियाँ जलाएंगे।
प्रार्थना करेंगे।
भजन गाएंगे।
लेकिन सोचिए:
माता मरियम को सबसे सुंदर जन्मदिन का उपहार क्या दिया जा सकता है?
हमारा हृदय।
आज कोई व्यक्ति अपने मन में कह सकता है:
“माँ, आज से मैं प्रतिदिन प्रार्थना करूँगा।”
कोई कह सकता है:
“माँ, मैं अपने पति/पत्नी को क्षमा करूँगा।”
कोई कह सकता है:
“माँ, मैं अपने माता-पिता से प्रेम और सम्मान से व्यवहार करूँगा।”
कोई कह सकता है:
“माँ, मैं अपने बच्चे के लिए प्रतिदिन प्रार्थना करूँगा।”
कोई कह सकता है:
“माँ, मैं अपने जीवन का एक पाप छोड़ने का प्रयास करूँगा।”
यही माता मरियम के लिए सुंदर जन्मदिन का उपहार होगा।
10. “Emmanuel” – परमेश्वर हमारे साथ हैं
आज के सुसमाचार का अंतिम संदेश अत्यंत सुंदर है:
“इम्मानुएल” – परमेश्वर हमारे साथ हैं।
यही मरियम के जीवन का फल है।
मरियम हमें यीशु देती हैं।
और यीशु हमें बताते हैं:
“परमेश्वर हमारे साथ हैं।”
जब जीवन में सब कुछ ठीक हो—परमेश्वर हमारे साथ हैं।
जब जीवन कठिन हो—परमेश्वर हमारे साथ हैं।
जब हम अकेले महसूस करें—परमेश्वर हमारे साथ हैं।
जब हमारी प्रार्थना का उत्तर देर से मिले—परमेश्वर हमारे साथ हैं।
जब हम आँसू बहाएँ—परमेश्वर हमारे साथ हैं।
Emmanuel!
परमेश्वर हमारे साथ हैं।
समापन
प्रिय भाइयों और बहनों,
आज हम पूरे आनंद से कहें:
“जन्मदिन की शुभकामनाएँ, हमारी प्यारी माता मरियम!”
लेकिन साथ ही हम परमेश्वर से कहें:
“हे प्रभु, मरियम को हमारे जीवन में देने के लिए धन्यवाद।”
माता मरियम हमें सिखाएँ—
- विश्वास करना,
- प्रतीक्षा करना,
- प्रार्थना करना,
- क्षमा करना,
- सेवा करना,
- दुख में टिके रहना,
- और सबसे बढ़कर यीशु को अपना जीवन समर्पित करना।
आज हम अपने परिवारों को माता मरियम को सौंपें।
अपने बच्चों को सौंपें।
अपने युवाओं को सौंपें।
अपने बुजुर्गों और बीमारों को सौंपें।
अपने parish को सौंपें।
और अपने जीवन की हर चिंता उनके हाथों में रखें।
माता मरियम, हमारे लिए प्रार्थना कीजिए।
माता मरियम, हमारे परिवारों को आशीष दीजिए।
माता मरियम, हमें यीशु के और निकट ले जाइए।
माता मरियम, हमें भी परमेश्वर की इच्छा के लिए “हाँ” कहना सिखाइए।
आमेन।


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